[ धान की अधिक पैदावार के उपाय 2021 ] जानिए धान में कंडुआ रोग | धान में झुलसा रोग की दवा- धान की पत्ती पीली होना

धान में कंडुआ रोग | धान की अधिक पैदावार के उपाय | धान में झुलसा रोग की दवा- धान की पत्ती पीली होना | धान की जड़ में कीड़ा | धान में खैरा रोग लगने की दवा | धान के कीट रोग | धान की फसल के प्रमुख रोग

धान की खेती करने वालों के किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या होती है कि फसल मे लगने वाले रोग, यदि किसान इन रोगों के प्रति समय पर जागरूक/ निवारण ना करें तो उपज-उत्पादन और लागत मे भारी नुकशान मे पहुँच सकता है | आइए जानते है धान के फसल के प्रमुख कीट-रोग के बारे मे जो धान की अच्छी पैदावार को प्रभावित करते है –

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धान में झुलसा रोग लक्षण और उसकी दवा –

धान की फसल मे यह एक ऐसा रोग है जो रोपाई के 15 दिन के बाद से लेकर धान की फसल पकते समय तक देखा जा सकता हैं | इस रोग की शुरुआती अवस्था में पौधे की निचली पतियों पर हल्के बैंगनी और सफेद रंग के धब्बे बनते हैं जो धीरे-धीरे बढ़कर आंख के समान पौधे की गाठों में भी इस रोग का असर धीरे-धीरे देखने को मिलता है तथा धीरे-धीरे वहां से गर्ल कर टूट जाती है | नई पत्तीयो मे पीले सूखे धब्बे दिखाई पड़ते है |

झुलसा रोग की दवा – Tebuconazol 25.9% EC/ फंगीसाइड को 250 ml प्रति लीटर की दर से प्रति एकड़ 200-250 लीटर पानी मे मिलकर कर देना चाहिए | यदि रोग ज्यादा है या रुका नहीं तो 10-12 दिन बाद वापस छिड़काव करना चाहिए |

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धान की पत्ती पीली रोग लक्षण और उसका निवारण ?

धान मे यह रोग नर्सरी से लेकर हरी फसल तक देखा जाता है | इस रोग में पत्ते के ऊपरी भाग हल्का पीला होने लगता है फिर धीरे-धीरे पीलाप्पन लेते हुए पूरा पत्ता पीला होने लग जाता है | रोग ग्रसित पौधे बहुत कमजोर हो जाते हैं उनमें कल्ले कम निकलते हैं | इस रोग का प्रकोप पौधों में बहुत ही तेजी से फैलता है जिस से पत्तियां सूख कर मर जाती हैं | यह रोग प्रमुख रूप से लोहे, कोपर, सल्फर आदि की कमी के कारण होता है |

धान की पत्ती पीली रोग दवा – रोकथाम के लिए 6 gm stepto or 300 gm copper oxychloride 50% WG (fungicide) प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी मे मिलकर छिड़काव कर सकते है | 2 सप्ताह बाद लगे की रोग रुका नहीं तो फिर इसी मात्रा में वापस एक बार छिड़काव कर देना चाहिए |

धान की अधिक पैदावार के उपाय

धान में कंडुआ रोग के लक्षण और उसकी दवा ?

हरदी/ कंडुआ रोग में बालियों मे तैयार दाने पीले रंग के फफूंद रूप मे बदल जाते हैं, जो बाद मे काले पाउडर मे बदल जाते हैं | धान की फसल में इस रोग का आना प्रमुख कारण मौसम मे लगातार परिवर्तन है |

जब दाना भरने के दिनों, तब ही इस रोग का प्रकोप होता है | दानों पर पीले रंग की मखमली फफूंद जैसे लक्षण दिखाई देते हैं | धान की बाली को हिलाने पर हल्दी जैसा पाउडर उड़ने लगता है और बाद में दानों में काला राख जैसा पाउडर भर जाता है यह एक बहुत ही गंभीर रोग है जो पूरी तैयार फसल को खराब कर देता है |

कण्डुआ रोगी पौधों में इस रोग का प्रकोप होने पर इसका इलाज संभव नहीं है, लेकिन बाकी फसल मे आप इसमे दवा का प्रयोग कर सकते हैं |

कंडुआ रोग दवा – बाली निकलने से एक या 2 सप्ताह पहले इस दवा का छिड़काव करें कॉपर ऑक्साइड 50% WP ( फंगीसाइड)  350 ग्राम प्रति एकड़, टीका के तौर पर 200  किलो पानी में घोलकर स्प्रे/ छिड़काव करें | और बाली निकलने के बाद Propiconazol 25% EC 300 मिली लीटर प्रति एकड़ 180 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें इस प्रकार दोनों दवाओं का छिड़काव कर हरदी/ कंडुआ रोग की रोकथाम हो सकती है |

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धान में भूरी चित्ती रोग –

धान में यह रोग भी लगभग पूरे देश में हर क्षेत्र में देखने को मिलता है | इस रोग से प्रभावित वाली फसल में शुरुआत में तिल के आकार के भूरे धब्बे होते हैं, फिर बाद में 2 से 3 सप्ताह में पूरी फसल में फैलने लगते हैं और पूरी फसल को रोगी बना देता है |

इस रोग के रोकथाम के लिए शुरुआती दिनों में लक्षण दिखाई देते ही – कार्बेंडाजिम 50% WP (फंगीसाइड ) 400 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से फसल में 200 लीटर पानी के साथ छिड़काव करना चाहिए |

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धान में खैरा रोग के लक्षण और उसकी दवा ?

  • खैरा रोग जिंक की कमी के चलते फैलता है |
  • इस रोग में फसल की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं बाद मे कत्थई रंग के धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं |
  • धान का पौधा छोटा रह जाता है और कल्लों का फुटाव भी कम होता है |

इस रोग की रोकथाम के लिए जिंक सल्फेट 33%, 5 किलोग्राम प्रति एकड़ यूरिया में मिलाकर फसल में छिड़काव दे सकते हैं |

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धान की अधिक पैदावार के उपाय ?

  • धान की नर्सरी गुणवतापूर्ण और देखरेख मे तैयार होनी चाहिए |
  • अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत की अच्छी जुटाई बुआई करनी चाहिए|
  • धान की अच्छी पैदावार और कीट-रोग से बचाने के लिए सतर्क और देखभाल करते रहना चाहिए |
  • धूप के समय खेत मे ज्यादा समय तक पानी का जमाव ना होने दे, इससे कई बीमारिया और फसल रोगी होने लगती है |
  • धान की फसल मे ज्यादा रासायनिक दवाइयों का प्रयोग न करें |
  • धान की रोपाई लाइन में करनी चाहिए, जिससे खरपतवार कम आती है और इसका निवारण भी आसानी से किया जा सकता है |

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धान में कौन कौन से रोग होते हैं?

धान की फसल के प्रमुख रोग – कंडुआ रोग, भूरी चित्ती रोग, झुलसा रोग, धान की पत्ती पीली होना, धान की जड़ में कीड़ा, खैरा रोग आदि प्रमुख रोग है जिनसे किसान और फसल प्रभावित होते है |

धान में झुलसा रोग की दवा ?

Tebuconazol 25.9% EC/ फंगीसाइड को 250 ml प्रति लीटर की दर से प्रति एकड़ 200-250 लीटर पानी मे मिलकर कर देना चाहिए | यदि रोग ज्यादा है या रुका नहीं तो 10-12 दिन बाद वापस छिड़काव करना चाहिए |

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