[ राजमा की खेती कब और कैसे करे 2022 ] Rajma Farming in Hindi

राजमा की खेती कैसे होती है | राजमा की खेती | राजमा क्या चीज है | राजमा कब लगाया जाता है | राजमा कौन सी फसल है | राजमा की खेती कब और कैसे करे | rajma ki kheti | राजमा का बीज कहां मिलेगा | राजमा की किस्में | राजमा का भाव | राजमा का भाव | Rajma Farming

राजमा दलहनी फसलों में जानी-मानी फसल है इसका उपयोग खाने-पीने के साथ कहीं उत्पाद बनाने मे उपयोग किया जाता है | राजमा मे प्रोटीन की अच्छी मात्रा 21-24% होने के कारण इसके दानों को तलकर, दाल मे तथा हरी फलीयो को सब्जी के रूप मे खाया जाता है | राजमा दिखने में मूंगफली के आकार की लाल रंग की होती है |

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राजमा की खेती कब और कैसे करे

राजमा की खेती करके किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं क्योंकि राजमा की फसल 4 महीने की खेती है बुआई से लेकर राजमा 4 माह मे पककर तैयार हो जाती है | आइए जानते हैं राजमा की फसल कैसे की जाती है, राजमा की खेती कैसे करें, राजमा के बाजार भाव, प्रति हेक्टेयर उत्पादन, आदि के बारे में संपूर्ण जानकारी

राजमा की खेती कब और कैसे करे ?

Rajma ki kheti रबी और खरीब की फसल मानी जाती है | Rajma भारत में उत्तर के मैदानी क्षेत्रो में अधिक उगाया जाता है | राजमा एक दलहनी फसलों में आता है | राजमा का पेड़ नहीं होता है बल्कि मूंगफली के समान राजमा का पौधा होता है जिसके 1 पौधे में 10 से लेकर 20-25 फलियों का लगना होता है राजमा की फसल 4 महीने की होती है-

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जलवायु और भूमि की आवश्यकता –

राजमा को शीत एवं समशीतोषण दोनों तरह की जलवायु में उगाया जा सकता है । राजमा की अच्छी बढ़वार हेतु 11 से 27 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान अच्छा माना जाता है। राजमा हल्की दोमट मिट्टी, काली से लेकर भारी चिकनी मिट्टी तक में उगाया जा सकता है ।

राजमा बुवाई का समय –

भारत मे राजमा की खेती रबी और खरीब की फसल की जाती है मैदानी इलाकों मे शीत ऋतु और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए खरीफ की खेती है |

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खरीफ की बुवाई अक्टूबर का का महिना बुवाई हेतु सर्वोत्तम माना जाता है। जबकि ठंडी के मौषम मे जनवरी से लेकर 15 फरबरी तक बुआई कर ली जाती है |

Rajma ki प्रजातियाँ ?

देश मे प्रचलित राजमा की कौन-कौनसी उन्नतशील प्रजातियां है जिनका इस्तेमाल हमें खेती में करना चाहिए | राजमा की किस्में

  • राजमा में प्रजातियां जैसे कि पी.डी.आर.14, इसे उदय भी कहते है
  • मालवीय 137
  • बी.एल.63
  • अम्बर
  • आई.आई.पी.आर.96-4
  • उत्कर्ष राजमा
  • आई.आई.पी.आर. 98-5
  • एच.पी.आर. 35
  • बी,एल 63 एवं अरुण है

खेत की तैयारी –

राजमा की फसल के लिए खेत की तैयारी कैसे करें इसके लिए किसान को अन्य प्रकार की फसलों की तैयारी के समय खेत तैयार करते हैं, उसी प्रकार फसल के लिए भी तैयार कर सकते हैं  | यह एक प्रकार की दलहनी फसलों में अंतर्गत आती है जिसे कम पानी की आवश्यकता होती है |

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मूंगफली की खेती होती है उसी प्रकार से खेत की तैयारी करनी होती है, तो इसके लिए किसान को पहले दो से तीन बार कल्टीवेटर हल, कृषि यंत्र से खेत की जुताई करा लेनी चाहिए | मिट्टी जितनी भुरभरी होगी उतना ही उत्पादन पर बढ़ोतरी के लिए असर पड़ेगा |

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Rajma Farming in Hindi

राजमा बीज बुवाई ?

बात करेंगे राजमा की बुवाई में बीजों की मात्रा प्रति हेक्टेयर कितनी लगती है और बीज का बीजोउपचार किस प्रकार से करे –

राजमा के बीज की मात्रा 120 से 140 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर लगती है। बीजोपचार 2 से 2.5 ग्राम थीरम से प्रति किलोग्राम बीज की मात्रा के हिसाब से बीज शोधन करना चाहिए ।

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राजमा की खेती मे बुआई की विधि ?

इसकी बुवाई लाइनो में करनी चाहिए-

  • लाइन से लाइन की दूरी 30 से 40 सेंटीमीटर रखे
  • पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखते है
  • इसकी बुवाई 5 से 6 सेंटीमीटर की गहराई पर करते है।

राजमा की बीज थोड़ा हार्ड/ कठोर होता है इसलिए इसको उगने में या अंकुरण में समय लगता है | राजमा मिट्टी से बाहर आने के लिए 20 से 25 दिन लग जाते हैं  |

राजमा की खेती में खाद एवं उर्वरक ?

राजमा की फसल में नाइट्रोजन को लेकर विशेष ध्यान रखना चाहिए | क्योंकि राजमा के पौधे की जड़ों में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत ही कम होती है इसलिए पहली सिंचाई के समय  यूरिया खाद का छिड़काव या सिचाई मे करना चाहिए |

राजमा के लिए 100 किलोग्राम नत्रजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस और 28-30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर तत्व के रूप में देना आवश्यक है।

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नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय तथा बची आधी नत्रजन की आधी मात्रा राजमा खड़ी फसल में देनी चाहिए। इसके साथ ही 20 किलोग्राम गंधक की मात्रा देने से लाभकारी परिणाम मिलते है।

20 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव बुवाई के बाद 30 दिन और 50 दिन में करने पर उपज अच्छी मिलती है।

राजमा की फसल में सिंचाई ?

राजमा की फसल मे 2 से 3 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई के 4 सप्ताह बाद प्रथम सिंचाई हल्की करनी चाहिए। बाद में सिंचाई एक माह बाद के अंतराल पर करनी चाहिए | खेत की मिट्टी और स्तर मे पानी का ठहराव न होना चाहिए।

राजमा की फसल में खरपतवार प्रबंधन ?

खड़ी फसल मे प्रथम सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। गुड़ाई के समय थोड़ी मिट्टी पौधों पर चढ़ाना चाहिए ताकि पौधों पर फलियां लगाने पर पौधों को सहारा मिल सके।

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खरपतवार रोकने हेतु बुवाई के बाद तुरंत ही उगने से पहले पेंडामेथलीन दवा का छिड़काव 3.3 लीटर / हेक्टेयर के हिसाब से 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

रोग प्रबंधन और कीट प्रबंधन –

राजमा में रोग-कीट जैसे कि सफ़ेद मक्खी एवं माहू कीट लगते है। इनके रोकने के लिए कीटनाशक 1.5 मिलीलीटर रोगर या डेमोक्रान दवाका छिड़काव करना चाहिए ।

राजमा पर जैसे कि पत्तियो पर मुजैक दिखते ही रोगार या डेमेक्रांन कीटनाशक को 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

मोजेक रोगी पौधों को प्रारम्भ में ही निकाल देना चाहिए साथ में डाईथेंन जेड 78 या एम् 45 को मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

राजमा की कटाई और मड़ाई का सही समय क्या है ?

राजमा की फसल जब फलियां 125 से 130 दिन में पककर तैयार हो जाये तब कटाई करके एक दिन के लिए खेत में पडी रहने देना चाहिए। दूसरे-तीसरे दिन मड़ाई करके दाना निकाल लेना चाहिए। अधिक सूखने पर फलियों से दाना चटककर/खुलकर बीज गिरने लगते है।

राजमा की फसल में प्रति हेक्टेयर पैदावार ?

देश मे राजमा की फसल में प्रति हेक्टेयर उपज की अच्छी सम्भावना होती है, बस निर्भर करता है खेती के तरीके पर | कृषि तकनीक का प्रयोग करते हुए राजमा की खेती में सामान्य रूप से 25 से 30 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है |

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राजमा का भाव /राजमा की कीमत ?

राजमा की कीमत के बाजार भाव की बात करें तो यह बाजार में ₹120 से लेकर ₹150 प्रति किलोग्राम बिकता है | तथा किसान भाई के लिए राजमा बीज की कीमत की बात करें तो ₹200 से लेकर 250-300 रुपए प्रति किलो वह राजमा की किस्में और वैरायटी पर निर्भर करता है | राजमा मंडी रेट के लिए अपनी नजदीकी मंडी से संपर्क करए क्योंकि हर दिन भावों मे उतार-चड़ाव बना रहता है |

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Rajma Farming in Hindi

भारत मे राजमा की खेती ?

राजमा एक प्रकार से अमेरिका फसल है और पहले यह फसल देश मे बहार से ही आती थी | लेकिन कृषि तकनीकों, नई किस्मो आदि के हिसाब से राजमा की बहुत सी वैराइटियों की खेती होने लगी है | भारत मे मुख्य रूप से हिमालयन रीजन की के पहाड़ी क्षेत्रो तथा महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु जसे राज्यो में इसका उत्पादन अधिक किया जाता है |

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