[ तरबूज की खेती 2022 ] जानिए हाइब्रिड तरबूज की खेती, बवाई समय, कमाई, की संपूर्ण जानकारी – Watermelon Farming in Hindi

Last Updated on January 29, 2022 by [email protected]

हाइब्रिड तरबूज की खेती | ताइवान तरबूज की खेती | तरबूज की खेती का समय | तरबूज की खेती से कमाई | तरबूज की खेती करने का तरीका | tarbuj ki kheti kaise hoti hai

मुनाफे और कम समय में तैयार होने वाली फसलो में शामिल तरबूज की खेती जिसकी मांग बाजार में अच्छी होती है | देश के मैदानी क्षेत्रों में बहुतया से होती है तरबूज की खेती, जिनकी देश के साथ विदेशो में भी है अच्छी मांग | आइये बात करेंगे आज तरबूज की खेती की संपूर्ण जानकारी –

तरबूज-की-खेती

तरबूज की खेती के बारे में जानकारी –

उत्तरी भारत के कई राज्यों में इसकी भरमार पैदावार ली जाती है | यह फसल हल्की भूमि और अच्छी तरह से तैयार भूमि में अच्छी पैदावार देती है | अच्छी कमाई देने के कारण कई प्रगतिशील किसान इस खेती में अपनी रूचि दिखा रहे है |

मिटटी और जलवायु –

रेतीली और बलुई मृदा, पीली मिटटी, काली मटियार मृदा सही मानी जाती है | ph मान की बात करें तो 6.5-7 ph मान वाली मृदा में अच्छा उत्पादन दे सकती है | मोषम और जलवायु में बीज बुवाई / पौध जमने के समय हल्की ठंडी चाहिए लेकिन बाकि फसल मुख्यत गर्म जलवायु में फलती-फूलती है | यह फसल 18 से 40 डिग्री तापमान सहन कर सकती है |

तरबूज की नर्सरी कैसे तैयार करें

तरबूज की खेती का समय –

उन्नत समय की माने तो यह मुख्यत जनवरी से मार्च के बीच बुवाई की जा सकती है |

तरबूज की अगेती खेतीसामान्य समयतरबूज की पछेती खेती
अगेती खेती में किसान जनवरी के शुरुआत से जनवरी के लास्ट सप्ताह तक बुवाई का काम पूरा कर सकते है |सबसे बढिया और उतम समय फरवरी माह माना जाता है |पछेती बुवाई मार्च के शुरुआत से लेकर 25 मार्च तक कर लेनी चाहिए |
तरबूज-की-हाइब्रिड-वैरायटी

तरबूज की उन्नत किस्में / वेराइटी ?

पूसा बेदानायह किस्म भी काफी किसानो की पहली पसंद की किस्म है | इस किस्म के तरबूज फलों में बीज नहीं होते हैं | यह तरबूज अच्छी मार्केटिंग, स्वादिष्ट एवं मीठे, गुदा का रंग गुलाबी होता है | इसकी फसल 80-95 दिन में पककर तैयार हो जाती है |
डब्ल्यू 19यह तरबूज मीडियम आकर की बनावट लेता है, इसके बहारी सहत पर गहरी हरी धारिया होती है | इसके फल उच्च गुणवत्ता एवं मीठे होते हैं | फसल 75 से 80 दिनों में पककर तैयार हो जाती है | शुष्क और अधिक तापमान वाले क्षेत्रो में इस वैरायटी को ज्यादा लगाया जाता है | इसकी बुवाई फरवरी मार्च में कर सकते है |
काशी पितांबरयह वैरायटी विशेष प्रकार की इस लिए है की इसके छिलके पीले रंग और अंदर से गुदा गुलाबी रंग का होता है | उत्पादन क्षमता कम मानी जाती है एनी किस्मो की तुलना मे – 150 क्विंटल के आस-पास |
अलका आकाशयह एक हाइब्रिड बीज किस्म है | इस तरबूज किस्म का फल अंडाकार एवं गुदा गुलाबी होता है | उपज इस वैरायटी की अच्छी मानी जाती है |
दुर्गापुर मीठाइस वैरायटी का तरबूज आकार में बढ़ा होता है, जिसका अधिकतम वजन 10 किलोग्राम तक भी हो सकता है | बाहरी आवरण गहरे हरे रंग का होता है खाने में स्वादिष्ट और मीठा होता है |
सुगर बेबी मार्केटिंग के तोर पर इस वैरायटीके तरबूज की खेती अच्छे से की जा सकती है | इसके हर फल का वजन 2 से 5 किलोग्राम में होता है खाने में स्वादि और गुदा गहरा लाल होता है | 80 से 90 दिन में पकने वाला यह किस्म जिसकी लगभग उपज 400 से 450 क्विंटल / हेक्टेयर तक ली जाती है |
न्यू हेम्पशायर मिडगटयह तरबूज की एक काफी उन्नत किस्म है, जिसके फलों का अधिकतम भार 20 किलोग्राम तक देखा जा सकता है | छिलका गहरा लाल और गुदा मिश्री लाल में बनता है |
अर्को मानिक यह किस्म फसल में लगने वाले रोगों के प्रति काफी सहनशील मानी जाती है | इस वैरायटी की भण्डारण एवं परिवहन क्षमता अच्छी है | बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है, 6 किलोग्राम के ओसत भार में यह फल देती है | इसकी अधिकतम पैदावार 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है जो 100 से 110 दिन में पककर तैयार होती है |

आशायी यामातो
यह तरबूज की जापानी वैरायटी है, माग कम होने के कारण इसकी बुवाई देश में कम की जा रही है |

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तरबूज की खेती करने का तरीका / विधि –

देश के कई राज्यों में इसकी खेती करने की अलग-अलग विधियों से करते है | सबसे पहले किसान को खेत की 2 बार हल या कल्टीवेटर से गहरी जुताई करा देनी है उसके बाद रोटावेटर की मदद से मिटटी को समतल करा लेनी है | तैयार समतल खेत में बेड या धोरा विधि या समतल तरीके में पौध/बीज की रोपाई कर सकते है |

बेड या धोरा विधिबुवाई के इस तरीके में बेड से बेड के बीच की दुरी 4 से 6 फिट रख सकते है | मल्चिंग पेपर 20 माइक्रोन का लगा सकते है, बेड पर बिज्से बीज की दुरी 2 से 3 फिट की रख सकते है | सिचाई में ड्रिप सिस्टम की मदद से सम्भव होता है |
– इस विधि में प्रति एकड़ 4000 से 5000 पौधो की जरूरत पड़ती है |
समतल तरीके में पौध/बीज की रोपाईइस प्रकार से बवाई सबसे आसान और इसे पुराना तरीका माना जाता है | बीजो को छिडकाव या समान दुरी पर रोपाई या फिर नर्सरी से तैयार पौधो को भी लगा सकते है | सिचाई के साधनों में ज्यादातर फवारा सिस्टम काम में लेना पड़ता है |
– पौध/बीज की रोपाई तरीके से 200 से 250 ग्राम / एकड़ बीज की आवश्यकता पड़ती है |
tarbuj-ki-kheti-kaise-hoti-hai
tarbooj ki kheti

सिंचाई और खाद-उर्वरक ?

खाद-उर्वरकसिंचाई
– खेत तैयारी के समय 20 टन पक्की हुई गोबर खाद +50 kg DAP खाद + 100 kg सिंगल सुपर फास्फेट पावडर डालना है |
– पौध लगाने के बाद 4 से 5 द्रिंचिग / भिगोना करना बहुत जरूरत होती है जिसमे NPK 19-19-19 / KG का 400 लिटर पानी में डालकर / एकड़ की दर से कर सकते है |
– पौधे लगाने से लेकर फसल 15 दिन की हो जाये उस समय में 4-5 द्रिंचिग / भिगोना विधि से प्रति पौधा 100 मिली लिटर जड़ में देना जरूरी है |
– सामान्य सिचाई सप्ताह में 3 बार करनी उचित मानी जाती है |

तरबूज की खेती से उत्पादन ?

बुवाई से लगभग 80 से 90 दिन बाद तरबूज तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है | अच्छी वैरायटी और देखभाल से तैयार तरबूज की फसल से लगभग 150 क्विंटल से 350 क्विंटल / हेक्टेयर तक का उत्पादन ले सकते है |

बाजार और मंडियों में तरबूज का रेट 1000 से 1500 रूपए प्रति क्विंटल के भावों में बिक जाता है | इस प्रकार 80 – 90 दें की फसल से 15000 से 300000 रूपये / हेक्टेयर की कमाई कर सकते है |

तरबूज की खेती में लागत ?

नई तकनीक यानी ड्रिप इरिगेशन तरीको से तरबूज की खेती तैयार करते है तो किसान को लगभग 60 हजार से 75 हजार तक का प्रति एकड़ खर्चा आ जाता है, जिसमे नर्सरी पौध, मिल्चिंग पेपर, खेत की तैयारी, निराई-गुड़ाई, लेबर खर्चा, खाद-दवा आदि शामिल है |

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तरबूज की खेती से कमाई ?

तरबूज की खेती कहां होती है ?

तरबूज की खेती व्यापारिक स्तर पर देश में प्रमुख मैदानी क्षेत्र के अलावा – राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, गुजरात जैसे राज्य में अच्छी पैदावार ली जाती है | साथ ही आजकल किसान ताइवान किस्म के तरबूज की खेती भी करके अच्छी रेट में विदेशो में निर्यात कर रहे है |

तरबूज की खेती किस महीने में होती है ?

यह मुख्यत जनवरी से 25 मार्च के बीच बुवाई की जा सकती है | और अगेती खेती से तैयार फसल बाजार में अप्रेल के मध्य दिनों में आना शुरू हो जाती है |

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